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300 रुपये से 20 लाख तक का सफर: जानिए कैसे गाँव की एक चौथी पास महिला ने बनाया वैश्विक ब्रांड

अगर आप करीब से देखें तो आप महसूस करेंगे कि प्रेरणा के ऊर्जा कण हमारे चारों तरफ फैले हुए हैं। उगता हुआ सूरज, एक शांत झील,  डूबता हुआ चाँद ऐसी बहुत सी अनगिनत चीज़ें, जगहें और लोग हैं जो प्रेरणा की कहानियाँ लिख रहे हैं। आज की कहानी ऐसी ही एक प्रेरणा देने वाली महिला की है जिन्होंने धागों से कढ़ाई करके कई महिला कारीगरों के जीवन में परिवर्तन किया है। पाबिबेन रबारी ने, जो पाबिबेन डॉट कॉम की संस्थापक हैं, गुजरात के कच्छ में स्थित महिला कारीगरों की इस पहली फर्म को जन्म दिया।

पाबिबेन कच्छ के अंजार तालुका के एक गांव भदरोई से आती हैं। जब वे पांच वर्ष की थीं तभी उनके पिता का देहांत हो गया। उस समय उनकी माँ को तीसरा बच्चा होने वाला था और उसी अवस्था में वह अपने बच्चों का पेट पालने के लिए मजदूरी भी करती थीं। पाबिबेन को अपनी माँ के संघर्षों को समझने में ज्यादा वक्त नहीं लगा।

पाबिबेन बताती हैं — “मैंने कक्षा चार के बाद स्कूल छोड़ दिया क्योंकि हममें  इससे ज्यादा शिक्षा प्राप्त करने की हैसियत नहीं थी। जब दस साल की हुई तब अपनी माँ के साथ मैं लोगों के घर काम पर जाने लगी। हमें घरों में पानी भरने के लिए उपयोग में लाया जाता था और उसके लिए हमें सिर्फ एक रुपया मिलता था। कुछ समय बाद मैंने माँ से पारम्परिक कढ़ाई सीखा।”

पाबिबेन आदिवासी समुदाय ढेबरिआ रबारी से आती हैं जो पारम्परिक कढ़ाई को जानने वाले होते हैं। इस समुदाय में एक ऐसा रिवाज होता है कि लड़कियां कपड़ों पर कढ़ाई कर उन्हें अपने ससुराल दहेज़ में लेकर जाती हैं। एक-दो महीने में एक परिधान तैयार होता है। इसका मतलब उन्हें दहेज़ के लिए कपड़े बनाने के लिए अपने माता-पिता के घर 30-35 वर्ष रहना पड़ता। इस समस्या को ख़त्म करने के लिए इस समुदाय के बुजुर्ग लोगों ने यह तय किया है कि कढ़ाई का उपयोग अपने खुद के लिए नहीं करेंगे।

1998 में पाबिबेन ने रबारी महिला समुदाय ज्वाइन किया जिसे एक एनजीओ फण्ड करती थी। वे चाहती थीं कि यह कला भी ख़त्म न हो और समुदाय का नियम भी भंग न हो। इसलिए उन्होंने हरी जरी की खोज की जो ट्रिम और रिबन की तरह रेडीमेड कपड़ों पर किया जाने वाला एक मशीन एप्लीकेशन होता है। छह-सात साल तक यहाँ काम करने के बाद उन्होंने कुशन कवर, रजाई और कपड़ों पर डिज़ाइन बनाना शुरू किया जिसके लिए उन्हें महीने में 300 रुपये मिलते थे।

पाबिबेन जब 18 वर्ष की थीं तब उनकी शादी कर दी गई और यहीं से उनके जीवन में बदलाव शुरू हुआ। कुछ विदेशी उनकी शादी देखने आये। उन्होंने उनके द्वारा बनाये बैग्स देखे, उन्हें वे बेहद पसंद आये। पाबिबेन ने उन्हें उपहार स्वरुप यह बैग देने का निश्चय किया। जो बैग वे लेकर गए उन्हें पाबी बैग के नाम से जाना जाने लगा और यह बाद में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिट हो गया।

केनफ़ोलिओज़ से खास बातचीत में पाबिबेन कहती हैं कि उनके पति भी उनके काम की तारीफ करते हैं और उन्हें गांव की महिलाओं के लिए बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित भी करते हैं। पांच साल बाद पाबिबेन ने एक और कदम उठाया। उन्होंने प्रदर्शनियों में भाग लेना शुरू किया और अपने कौशल को और भी निखारा। वे पहले से ज्यादा निडर हो गई और आत्मविश्वास से भर गई। कुछ समय के बाद उन्होंने गांव की महिलाओं के साथ मिलकर काम शुरू किया और फिर पाबिबेन डॉट कॉम  का जन्म हुआ। उनका पहला आर्डर 70,000 रूपये का था, जो अहमदाबाद से मिला था। बाद में उन्हें गुजरात सरकार की तरफ से भी ग्रांट मिला।

आज पाबिबेन की टीम में 60 महिला कारीगर हैं और वे लगभग 25 तरह की डिज़ाइन बनाती हैं। उनकी वेबसाइट का टर्न-ओवर 20 लाख रूपये का है। उन्हें 2016 में ग्रामीण इंटरप्रेन्योर के लिए जानकी देवी बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके बनाये बैग्स बहुत सी बॉलीवुड और हॉलीवुड फिल्मों में देखने को मिलती है। पाबिबेन अपने गांव की दूसरी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती है।

पाबिबेन उन तमाम महिलाओं के लिए आदर्श हैं जो जीवन में कुछ अपना और अलग करना चाहती हैं। उन्होंने बहुत सारी रबारी महिलाओं का जीवन बदल कर रख कर रख दिया, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और साथ ही साथ परिवार का कमाऊ व्यक्ति भी। उनकी वेबसाइट पाबिबेन डॉट कॉम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी लोकप्रिय हो गई है। वे चाहती हैं कि पाबिबेन डॉट कॉम उस मक़ाम तक पहुंचे जिसके जरिये कम से कम 500 महिलाएं आत्मनिर्भर बन पाएं।

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