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10 हजार की नौकरी, एक फैक्स-मशीन, साधारण शुरुआत से 500 करोड़ की कंपनी बनने की कहानी

1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, समाज ने जीवन जीने के तरीकों में तेजी से बदलाव प्रदर्शित किए हैं। आज, जब युवा पीढ़ी परिवर्तन का नेतृत्व कर रही है और अपनी दूरदर्शिता से जीवनशैली बेहद आसान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तब भी 70, 80 और 90 के दशकों में आम आदमी ने जो संघर्ष किए, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

भारत की स्वतंत्रता के बाद दशकों से चली आ रही समस्याएं आधुनिक समय के संघर्षों से काफी अलग थीं। गरीबी से जूझ रहे परिवार में शिक्षा पूरी करना आसान नहीं था और पढ़ाई के बाद नौकरी मिलने में भी काफी चुनौतियाँ थी। भारत के सामाजिक-अर्थशास्त्र में बहुत से परिवर्तन हो रहे, जिससे कई कंपनियों का उत्थान और पतन हो रहा और परिणामस्वरूप नौकरियों में भी कमी आ रही। हमारी आज की कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है, जिसने 90 के दशक में इन तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए सफलता का एक शानदार साम्राज्य बनाया।

56 वर्षीय रवींद्र जगताप का जन्म पुणे के एक विशिष्ट मध्यम-वर्गीय परिवार में हुआ था। अपने माता-पिता के चार बच्चों में से एक, रवींद्र के लिए इंजीनियरिंग की डिग्री एकमात्र उम्मीद थी – उन्होंने बड़ी कठिनाइयों के बीच अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती नौकरी पाना था।

कुछ वर्षों तक नौकरी ढूंढने के बाद, रवींद्र ने मेटाकेम नामक एक कंपनी में नौकरी कर ली और अगले वर्ष शादी भी। जीवन लगातार आगे बढ़ रहा था, लेकिन रविंद्र के अंदर कहीं-न-कहीं उद्यमशीलता की आग जल रही थी। एक मध्यम वर्गीय परिवार के नौजवान के पास खुद की कंपनी स्थापित करना अकल्पनीय था – आर्थिक और मनोवैज्ञानिक दोनों रूप से। ऑफिस आने-जाने के दौरान, रवींद्र अक्सर सिग्नल में एक भव्य कार में आदित्य बिड़ला (बिड़ला समूह के मालिक) को देखा करते थे। वह एक व्यवसायिक कैरियर से इतना अधिक मोहित हो चुके थे कि उसने अपने नवजात बेटे का नाम तक ‘आदित्य’ ही रख दिया। उस परिस्थिति में अपनी उद्यमी महत्वाकांक्षाओं को खुश करने के लिए यह पर्याप्त था।

अचानक रवींद्र की कंपनी के मालिक का साल 1995 में निधन हो गया। नए प्रबंधन ने कंपनी को एक नई दिशा में ले जाने का फैसला किया। अपने मेंटर के निधन और कंपनी में तेजी से बदलाव के कारण रवींद्र ने अपना पद छोड़ दिया। 5000-10000 रुपये की मामूली तनख्वाह ने उन्हें कभी मुंबई जैसे शहर में भविष्य के लिए कुछ भी बचाने की अनुमति नहीं दी। वह रविंद्र के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय था। नए रोजगार की तलाश और परिवार की देखभाल एक भारी बोझ थी, लेकिन वह आशान्वित थे। यह रवींद्र की आशा ही थी जिसने उन्हें स्वरोजगार पर विचार करने के लिए मना लिया। लेकिन, सबसे बड़ी चुनौती बिना किसी कार्यशील पूंजी के शुरूआत करना था। रवींद्र को कुछ नया करना था। प्रारंभिक शोध के बाद, उन्होंने फैसला किया कि वह फार्मा सेक्टर में इस्तेमाल होने वाले अवयव से संबंधित व्यापार करेंगे।

केनफ़ोलिओज़ के साथ विशेष साक्षात्कार में रवींद्र ने बताया कि “शुरू करने के लिए, मेरे पास बस एक फैक्स-मशीन थी जिसे मैंने अपनी पिछली कंपनी के साथ काम करते समय इस्तेमाल करता था। उस साधारण फैक्स-मशीन ने मुझे संभावित ग्राहकों तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया, जिसने बाद में मेरा भाग्य बदल दिया।

रवींद्र ने आस्ट्रिड इंटरनेशनल के बैनर तले अपने सपने की नींव रखी। यह वर्ष 1997 था, तब कंपनी केवल एक उत्पाद ‘मेटफॉर्मिन एचसीएल’ की डील करती थी। रवींद्र ने एपीआई उत्पादों पर शोध किया, जिन्हें अन्य देशों में निर्यात किया जा सकता था। साथ ही, वह व्यापार निर्देशिकाओं की मदद से राष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों का पता लगाने के लिए पुस्तकालयों का दौरा करते रहे। यह पूर्व-ईमेल युग था और उस समय डाक मेल ही सम्पर्क का एकमात्र जरिया था। डाक मेल के जरिये उत्तर प्राप्त होने में दो महीने तक प्रतीक्षा करनी होती थी। लम्बे इंतज़ार के बाद भी उन्हें किसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी का उत्तर नहीं मिला। रवींद्र हार नहीं माने और लगातार काम करना जारी रखा, छोटे से लेकर बड़े ग्राहक ढूंढे। साल 1997 में अस्तित्व के लिए शुरू की गई गतिविधि ने पहले ही वर्ष 20 लाख रुपये का कारोबार किया।

आज, आस्ट्रिड समूह का वार्षिक कारोबार 150 करोड़ रुपये और मूल्यांकन 500 करोड़ के पार है। हालांकि उनकी ट्रेडिंग विंग अभी भी चालू है। महाराष्ट्र के मलाड इलाके में कंपनी की अपनी विनिर्माण इकाई है। कंपनी की रिसर्च विंग लगातार नए-नए उत्पादों पर शोध कर रही है। भारत, चीन और दुबई में अपने स्वयं के कार्यालय होने के कारण – आस्ट्रिड दुनिया भर में 50 से अधिक देशों को निर्यात कर रहा है। कंपनी ने पर्यावरणीय स्थिरता लाने के इरादे से एक नई ग्रीनफील्ड विनिर्माण सुविधा पर भी काम करना शुरू कर दिया है। 50 करोड़ रुपये की लागत इस नई इकाई को बनाया जा रहा है।

आज रवींद्र जगताप फार्मा उद्योग में एक सम्मानित व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। उनकी कंपनी भारत और वैश्विक स्तर पर लगभग सभी बड़ी फार्मा कंपनियों के साथ काम करती है। फार्मा क्षेत्र में उनके काम का सम्मान करते हुए, कंपनी को आयात विकल्प में अपने काम के लिए भारत सरकार द्वारा ‘मेक इन इंडिया’ के प्रोत्साहन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। रवींद्र की प्रेरणादायक कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और कभी न हार मानने वाले जज़्बे के साथ कैसे एक साधारण आदमी भी असाधारण उपलब्धियां हासिल कर सकता है।

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