in

स्मार्ट आइडिया: कैसे वह परंपराओं और पर्यावरण के संरक्षण के साथ-साथ कर रही हैं जरूरतमंद लोगों की मदद

क्या यह अनिवार्य है कि हम प्रगतिशील विचारों को अपनाने के लिए अपनी संस्कृति और परंपराओं से अलग हो जाएं? क्या हमारी परंपराओं को जिंदा रखने के लिए किए कार्यों से पर्यावरण को हानि पहुँचेगी? क्या हमें एक प्रगतिशील समाज बनाने के लिए अपनी परंपराओं को भूल जाना चाहिए? – ‘नहीं’, हमें इसकी आवश्यकता नहीं है हम अपनी परंपराओं और सामाजिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाकर एक प्रगतिशील बदलाव ला सकते हैं, और रिंटू राठौड़ जैसे लोग इसे साबित करने के लिए जीवंत उदाहरण हैं।

रिंटू पेशे से एक कमर्शियल डिज़ाइनर है और मुंबई में रहती है। सबसे ख़ास बात यह है कि वह चॉकलेट से मूर्तियां बनाती हैं। जब उन्हें अपने काम का वर्णन करने के सबसे अच्छे तरीके के बारे में पूछा गया, तो वह गर्व से कहती है, “मैं आपकी एक चॉकलेट प्रतिकृति बना सकती हूं।”

“मैं चॉकलेट से आपकी एक मूर्ति बना सकती हूं।” – रिंटू ने टीम केनफ़ोलिओज़ से बातचीत में कहा।

रिंटू सफलतापूर्वक चॉकलेट बनाने का अपना व्यवसाय चला रही थी। यह वर्ष 2014 था जब जम्मू और कश्मीर में भारत के उत्तरी हिस्से में विनाशकारी भूकंप आया था। भारतीय सशस्त्र बल और आपदा प्रबंधन दल लगातार भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में बचाव अभियान चला रहे थे।

रिंटू ने महसूस किया कि सशस्त्र बलों द्वारा भोजन की आपूर्ति ज्यादातर सूखी-खाद्य सामग्री है, और पीड़ित लोग घर-पकाया भोजन के लिए तरस रहे हैं। तभी उन्होंने थपलस – ‘एक गुजराती व्यंजन जो मसालेदार रोटी की तरह होता है’ तैयार करने का फैसला किया और अन्य दोस्तों को भी इस आंदोलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। उसका व्हाट्सएप संदेश वायरल हो गया, और टीम ने 35000 थपलस तैयार किए जिन्हें बाद में कश्मीर भेज दिया गया। इस घटना ने उन्हें ‘फूड-आर्मी’ नाम के एक समूह में शामिल किया, जिसने नेपाल भूकंप और केरल बाढ़ सहित लगभग सभी प्राकृतिक आपदाओं में पीड़ितों की मदद की।

एक दिन रिंटू मुंबई के जुहू बीच पर सुबह की सैर कर रही थी। वार्षिक ‘गणेश महोत्सव’ ख़त्म हो चुका था और आसपास के क्षेत्रों के लोगों ने जुहू समुद्र तट पर मूर्तियों का विसर्जन किया था। वहाँ पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) से बनी मूर्तियां टूटी हुई पड़ी थीं, और लोग उसपर पैर रखते हुए आ जा रहे थे। भगवान गणेश की अनुयायी रिंटू ने यह सब देखा तो, उन्हें बहुत दुःख हुआ। समस्या को दूर करने के लिए कुछ करने का विचार उसके मन में कौंधता रहा और तभी उन्हें चॉकलेट से गणेश मूर्तियां बनाने का आइडिया आया।

रिंटू ने इसे एक पेशा नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन बनाने का फैसला किया। चॉकलेट गणेश बनाने और अनुष्ठान के अनुसार उन्हें दूध में डुबोने का विचार एक महान विचार था – उन्हें बड़े पैमाने पर सराहना मिली। यह आइडिया पर्यावरण समर्थक तो था ही, साथ ही प्रसाद के रूप में चॉकलेट दूध का उपयोग भी किया जा सकता।

गैर-वाणिज्यिक विचार होने के बावजूद, उन्हें आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा। लेकिन सराहना आलोचक की तुलना में बहुत अधिक थी और उन्होंने अपने काम को जारी रखा। वह वैकल्पिक और पर्यावरण के अनुकूल परिवर्तन के रूप में चॉकलेट गणेश को बढ़ावा दे रही हैं।

ऐसी दुनिया में जहां हम अपनी परंपराओं को छोड़े बिना प्रगतिशील विचारों को अपनाने के लिए तैयार हैं, रिंटू जैसे लोगों की सोच बेहद प्रशंसनीय और अनुकरणीय है जो हमारे अतीत के साथ बंधन को खोए बिना भविष्य को गले लगाने के लिए एक मजबूत सीख देती हैं।

आप अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं और पोस्ट अच्छी लगी तो शेयर अवश्य करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading…

0