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वकालत छोड़ शुरू किया सीप पालन, 12×15 के तालाब में 5,000 सीपियों से हो रही लाखों की कमाई

अगर हौसले बुलंद हो तो इंसान लाख बार थकने के बाद भी उठकर खड़ा हो ही जाता है। और इसी तरह के बुलंद हौसले की जरूरत है आज के युवाओं में, जो अपनी छोटी सी निराशा से भी हताश हो जाते हैं। अगर इंसान ठान ले तो पानी में आग लगाये या न लगाये पर पानी में मोतियाँ जरूर पैदा कर सकता है। जी हां आप बिलकुल सही सुन रहे हैं, अब वो दिन पुराने हो गए जब खेती बस अनाज़, फलों और सब्जियों की हुआ करती थी।

आजकल कुछ लोग मोती की भी खेती कर लाखों की कमाई कर रहे हैं। हमारी आज की कहानी एक ऐसे ही शख्स के इर्द-गिर्द घूम रही है जो अपने गाँव में ही सीपियों को पालते हैं और उसमें कृत्रिम रूप से मोती तैयार करते हैं।

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के पारडी गाँव के रहने वाले संजय गटाडे पूरे विदर्भ में अपनी मोती की खेती के लिए जाने जाते हैं। पहले संजय का परिवार भी परंपरागत खेती पर ही निर्भर था लेकिन उन्होंने कुछ अलग करने की ठानी। बचपन में सीपियों से खेलते-खेलते कब उनकी रूचि सीपी पालन में तब्दील हो गई उन्हें पता ही नहीं चला। आज संजय खुद के द्वारा बनाई गयी तालाब में सीपियाँ पालते हैं और कृत्रिम रूप से उसमें मोती तैयार करते है। 33 वर्षीय संजय आज इसी काम के द्वारा न सिर्फ लाखों कमा रहे हैं बल्कि बहुत सारे लोगों को भी यह कला सीखा रहे हैं।

केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बात-चीत के दौरान संजय ने बताया कि मैंने बचपन से ही सीपियों को बहुत नज़दीक से देखा है। मेरे गाँव के पास से ही वैनगंगा नाम की नदी बहती है। उसमें ढेर सारी सीपियां पड़ी रहती थीं और मैं बचपन में उससे खेला करता था। जब भी हम रोते तो पिताजी हमारे हाथों में ये सीपि रख देते और हम खुश हो जाते थे। धीरे-धीरे जब हम बड़े हुए तो जाना की इन सीपियों में भी जान होती है और इसी के अंदर मोती पैदा होते हैं। धीरे-धीरे मैंने इसके बारे में जानकारियां जुटानी इकट्ठा की।

उस दौरान संजय पढ़ाई ही करते थे, उनके पिता एक साधारण किसान थे और खेती के माध्यम से ही उनका घर चलता था। संजय को दसवीं कक्षा तक पढ़ने में कोई ख़ास रूचि नहीं थी पर गाँव में ही एक क़रीबी की नौकरी लगा देख 12वीं में उन्होंने खूब मेहनत की और 70 फीसदी अंक भी हासिल किया। संजय ने उसके बाद एलएलबी की भी पढ़ाई की पर सीपि पालन में उनकी रूचि इतनी अधिक हो गयी थी की उन्होंने वकालत करने का कभी सोचा भी नहीं।

संजय का कहना है कि हम प्राकृतिक मोतियाँ तैयार करते है, भले ही हमारा तरीका कृत्रिम हो। पहले मैंने भी लोगों से सुना कि सीपियों में कंकड़ या मिट्टी डालने से मोती तैयार हो जाती है और मैंने प्रयास भी किया पर सीपियाँ कुछ महीनों के बाद मर जाती थीं। फिर धीरे-धीरे काफी शोध के बाद अब मैं कोई भी बाजार की चीज़ का इस्तेमाल नहीं करता बल्कि खुद ही 12 अलग-अलग प्राकृतिक चीजों से एक मोती बीज तैयार करता हूँ। इससे बहुत ही गुणवत्तापूर्ण मोती तो प्राप्त होता ही है साथ ही साथ सीपि का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है और वे बीमार नहीं पड़ती।

“मेरी मोतियाँ पूरी तरह प्राकृतिक हैं और उनमें औषधीय गुण मौजूद हैं जो बहुत तरह की बिमारियों को भगाने में काम आते हैं। जिस कारण बाजार में उसकी कीमत भी अधिक मिलती है। मेरी खुद की बेटी जन्म के समय मात्र 1.4 किलो की थी, पर 2 माह के बाद ही मैंने उसे खुद के द्वारा तैयार मोती चटवाना शुरू किया। फलस्वरूप आज 1.5 साल की होने पर उसका वजन 8.5 किलो हो गया है।”

शुरुआत में संजय को घाटे का भी सामना करना पड़ा था। जब उन्होंने अपने पास के तालाब में सीपियों को पालना शुरू किया, तो उनकी सीपियों को भी किसी नें चुरा लिया, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा था। उसके बाद संजय ने फैसला किया कि वे अपने घर में ही तालाब बनवा कर मोती की खेती करेंगे। फिलहाल वे अभी 12×15 के तालाब में करीब 5,000 सीपियों को पाल रहे हैं। वे अभी 2 और 15×15 के तालाब बनवा रहे हैं, जिसके बाद उनके पास 20,000 सीपियाँ हो जाएंगी। संजय महीने में एक बार सीपियों को पानी नें निकाल उसे साफ़ करते हैं। संजय की पत्नी सीमा भी उनको इस काम में मदद करती हैं।

संजय के मोतीओं की क़्वालिटी अच्छी होने के कारण वे 1 मोती कम से कम 2000 रुपये में बेचते हैं। उनकी इस मोती की खेती करने की कला को सिखने दूर-दूर से लोग पहुँचते हैं।

संजय ने पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया करने का साहस किया और आज अपनी सफलता से खेती-किसानी में करियर ढूंढ रहे लोगों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।

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