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बिल्डिंग की छत पर शुरू की खेती, आज सोसाइटी का हर परिवार खा रहा है जैविक सब्जियाँ

कहते हैं कि उम्र सिर्फ एक संख्या है। और यह कहावत बिल्कुल सत्य है, अगर आप यह नहीं मानते हैं तो यक़ीन मानिए हमारी आज की इस कहानी को पढ़ने के बाद आपका भी नज़रिया बदल जाएगा। टेरेस फार्मिंग के ज़रिए अपनी सफलता की कहानी लिखने वाली मुम्बई की 50 वर्षीया आरती चौहान ने यह साबित कर दिखाया है कि यदि कुछ कर गुजरने की चाहत हो तो इस दुनिया में कुछ भी मुश्किल नहीं है।

आरती मुंबई के मुलुंड इलाके की रहने वाली है। मुलुंड शंग्रीला नामक इस सोसाइटी में कुल 46 परिवार रहते हैं। आज से पांच वर्ष पहले बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) ने इस सोसाइटी को एक नोटिस भेजा था, जिसके तहत गीले और सूखे कचरे को अलग करने तथा गीले कचरे (जिसे हरे कचरे के रूप में भी जाना जाता है) से जैविक खाद बनाने की प्रकिया को अपनाया जाए। बीएमसी का यह अभियान मुंबई डंप यार्ड में कचरे के ढेर को कम करने और प्रदूषण कम करने के लिए शुरू किया गया था।

गौरतलब है कि इस सोसाइटी के लोग पर्यावरण की स्वच्छता को लेकर पहले से ही सचेत थे इसलिए बीएमसी के नोटिस के बाद उन्होंने सामूहिक रूप से कचरा प्रबंधन की दिशा में काम करना शुरू किया। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह सोसाइटी सालाना 6000 किलोग्राम गीला कचरा इकट्ठा करती है जिसे 500-600 किलोग्राम उर्वरक में बदल जाता है।

शुरुआत में, सोसाइटी के लोग अपनी बालकनी बागवानी के लिए उर्वरक का उपयोग करने लगे। हालांकि, सभी उर्वरकों का उपयोग नहीं हो पा रहा था। प्रचुर मात्रा में उपलब्ध जैविक खादों का सही इस्तेमाल करने के उद्देश्य से आरती ने रिसर्च करना शुरू किया। खेती-किसानी में उनकी दिलचस्पी ने आर्गेनिक टेरेस फार्मिंग की तरफ़ उनका ध्यान आकर्षित किया। और फिर क्या उन्होंने दो वर्ष पहले छत पर खेती की पहली बीज बोई।

केनफ़ोलिओज़ के साथ साक्षात्कार में आरती ने बताया कि “मुझे विभिन्न चीजें करने में हमेशा से दिलचस्पी रही है। जहां भी मैं हाथ आज़माती हूँ, मैं सफल होती हूँ।

अर्थशास्त्र में एम.कॉम की डिग्री हासिल की हुई आरती पेशे से एक शिक्षिका थीं और साल 2007 में उन्होंने अपनी नौकरी को छोड़ दिया था। हालांकि आज वह एक सफल गृहणी के रूप में हमारे सामने खड़ी हैं।

आरती वैसी सब्जियों की खेती करती हैं जो बढ़ने में आसान हैं तथा कम रख-रखाव की मांग करते हैं। सोसाइटी के लोगों ने आरती की सराहना करना शुरू कर दिया जब उन्हें खाने के लिए जैविक सब्जियां मिलेंगी। जल्दी ही उन्हें जैविक खेती में उनके मेहनत का फल दिखाई देने लगा और अब वह पालक, गोभी, फूलगोभी, क्लस्टर बीन्स, टमाटर, मिर्च, नींबू, करेला, ब्रोकोली आदि उगाना शुरू कर दिया।

“इमारत की छत 6000 वर्ग फुट की है और मैं 3000 वर्ग फुट में जैविक सब्जियां उगाती हूँ। मैं हर दिन दो किलोग्राम से अधिक सब्जियों का उत्पादन करती हूँ और उन्हें सोसाइटी के लोगों में वितरित करती हूँ।

आरती फसलों की देखभाल करने के लिए हर दिन तीन घंटे का वक़्त देती हैं। 5 बजे उठने के बाद वह सुबह 6:00 से 7:30 और शाम को 5:30 से 7:00 बजे तक वह खेती के कार्यों में अपना समय देती हैं। इन कार्यों में पिछले दो वर्षों में उन्होंने कुल 48 हज़ार रुपये निवेश भी किया है, जिसमें सोसाइटी के लोगों ने भी इच्छानुसार अपना योगदान दिया है।

लॉकडाउन में टेरेस खेती मेरे लिए बहुत मददगार थी। कई सारे लोग लॉकडाउन में खालीपन का शिकार हो रहे थे, जबकि मेरे लिए यह समय खेती की गतिविधि में गुजर जाती थी।

इमारत की छत को जैविक खेत में बदलने की पहल के कारण, मुंबई स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था ‘हरियाली’ ने उन्हें संयुक्त सचिव के रूप में नियुक्त किया है। इतना ही नहीं, मुंबई म्युनिसिपैलिटी द्वारा सोसाइटी को अब ‘जीरो गार्बेज सोसाइटी’ का टैग भी मिल गया है तथा सोसाइटी वालो को कर में 10 फ़ीसदी की छूट भी मिल रही है।

बदलते वक्त के साथ टेरेस फार्मिंग एक शानदार खेती के विकल्प के रुप में उभर रहा है। ख़ासकर बड़े-बड़े महानगरों में जहाँ जैविक फल-सब्जियों के नाम पर लोगों से कई गुणा ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं, ऐसे में खेती-किसानी की यह तरक़ीब एक बेहतर विकल्प के रूप में उपलब्ध है। इससे जहाँ एक तरफ़ गीले कचरे की सार्थक उपयोगिता होगी, वहीं लोगों को स्वच्छ व जैविक सब्जियाँ भी मिल जाएगी।

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