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परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के लिए मेरे पास हज़ार कारण थे, किंतु मेरे जुनून ने मुझे ज़िंदा रखा

सफलता खुद-ब-खुद जिंदगी के दरवाज़े पे दस्तक़ नहीं दे जाती। परिस्थितयों से आपको मुकाबला करना पड़ता है और पथरीले रास्तों पर आगे बढ़ते चले जाना होता है। जब आपकी शारीरिक अक्षमता आपके आगे बढ़ने में सबसे बड़ी बाधा बन कर खड़ी हो जाये, तब इच्छाशक्ति और संकल्प आपकी बैसाखियाँ बन जाती हैं। आज की यह कहानी कुछ ऐसी ही है।

उन्होंने तीन साल की उम्र में ही नृत्य सीखना शुरू कर दिया था। नृत्य के प्रति उनके लगाव ने उन्हें एक चमकता सितारा बना दिया। 16 वर्ष की उम्र तक वे 75 स्टेज परफॉरमेंस दे चुकी थी। परन्तु नियति अपने हिसाब से ही चलती है, वह कुछ और ही खुराफात करने के लिए तैयार थी। जब वे यह महसूस करना लगीं कि नृत्य ही उनका जुनून है, ज़िन्दगी ने उन्हें एक अजीब से मोड़ पर ला खड़ा कर दिया।

अचानक उनका सामना जीवन को बदल कर रख देने वाली एक दुर्घटना से हुई। वे बस में सफर कर रही थीं और उनका एक्सीडेंट हो गया। उनके दाहिने पैर के टिश्यू क्षतिग्रस्त हो चुके थे और गैंग्रीन उनके पूरे दाहिने पैर में फ़ैल चुका था।जिसकी वजह से उनका दाहिना पैर काटना पड़ा। तीन साल के लम्बे इंतजार के बाद वे नकली पैरों से चल तो पायीं पर कृत्रिम पैरों से नृत्य के अपने शौक को पुनर्जीवित करने की बात अभी सोचना भी असंगत लग रही थी। परन्तु बहुत सारी चुनौतियों के बावजूद सुधा चंद्रन ने यह सिद्ध कर दिया कि कोई भी बाधा उनके जुनून तक पहुंचने से उन्हें रोक नहीं पायेगी।

1986 में उनकी जीवन-गाथा पर बनी फिल्म नाचे मयूरी लोकप्रियता और व्यावसायिक सफलता के मानदंडों पर बेहद सफल साबित हुई। उन्होंने कई डांस रिआलिटी शो में बतौर जज भी सेवाएं दी हैं।

अपनी प्रेरणाओं के बारे में सुधा चंद्रन ने केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में खुल कर साझा की।

“सब कुछ भूल कर आगे बढ़ना और खुद से वह कहना कि यह सिर्फ एक एक्सीडेंट था और सिर्फ एक पैर ही तो गया है, यह आसान नहीं था। इसके लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता थी। मुझे याद है कुछ ऐसे लोग भी घर पर आते और मुझसे कहते कि “हम आशा करते हैं कि तुम फिर से डांस कर पाओगी।” परन्तु इस चुनौती को स्वीकार कर पाना मेरे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था। यह बहुत ही मुश्किल है कि जब आप निजी जीवन में आपदाओं को सामने खड़ी और आपको घूरती हुई पाते हैं और आप को समझ नहीं आ रहा हो कि कैसे इसका सामना करें।”

मैं जिंदगी में हमेशा ऐसे लोगों से मिली जो मुझे केवल सलाह ही देते थे। जब मैं अपने जीवन के परिवर्तनकारी मोड़ से गुजर रही थी और अपने जीवन में स्पष्टता ढूंढने की कोशिश कर रही थी, लोग आकर मुझे और भी अधिक भ्रमित कर चले जाते थे। मैं यह जानती थी कि मेरी शिक्षा के बल पर मुझे वह सब कुछ मिल जायेगा जो मैं चाहती हूँ। मैंने जो कुछ खो दिया था उसे पाने की चाह थी मुझमें, क्योंकि जब आप कुछ खोते हैं तभी आप उसके महत्त्व को समझ पाते हैं। मुझे पता था कि डांस मेरे लिए कितना महत्वपूर्ण है पर जब कोई कहे कि आप फिर कभी डांस नहीं कर पाएंगी, यह बेहद दुःखद होता था मेरे लिए।

मैं दुनिया को यह दिखा देना चाहती थी कि पैर न होते हुए भी मैं डांस कर सकती हूँ। तब मैंने अपना दिमाग, शरीर, दिल, और ढ़ेर सारा वक़्त अपने नए डांसिंग शूज में लगा दिए। बहुत ही दर्द भरी प्रक्रिया थी परन्तु हर कदम पर यही अहसास होता कि मैं यही तो चाहती थी। तब एक दिन मैंने अपने पिता से जाकर कहा कि मैं फिर से परफॉर्म करुँगी, यह सुनकर वे स्तब्ध रह गए। सुबह के न्यूज़ पेपर में यह खबर छपी “लूज़ेज़ अ फुट, वॉक्स अ माइल।” मेरे पहले शो की पूरी टिकट्स बिक चुकी थीं। मैं काफ़ी बैचैन थी परन्तु मैंने अपना परफॉरमेंस आराम से दिया और लोगों से स्टैंडिंग ओवेशन भी प्राप्त किया। और ऐसे ही एक नया अध्याय शुरू हुआ।

आज अधिकतर लोग तनाव के शिकार हो जाते हैं और या तो हार मान लेते हैं या आत्महत्या की कोशिश करते हैं। परन्तु यह जिंदगी की चुनौतियों का जवाब नहीं है। समझना चाहिए यह लड़ाई आसान नहीं है परन्तु कोशिश करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

जब मैंने सात साल बाद वापसी की तब इस इंडस्ट्री में मेरा गर्मजोशी से स्वागत किया। मैंने यह सिद्ध कर दिया था कि मैं बिल्कुल सामान्य हूँ। और इसी से ही मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने कड़ी मेहनत की, लोगों को यह बताने के लिए कि मैं यह कर सकती हूँ।

अब तक मेरे जीवन की कहानी एक रोलर कोस्टर राइड की तरह थी परन्तु थी सुन्दर। इसने मुझे समझदार, अधिक बुद्धिमान, ज़मीनी और अपने प्रोफेशन और रिश्तों के लिए सम्मान करना सिखाया। अगर मैं अपना बैलेंस शीट देखूं तो मैं महसूस  करती हूँ कि जितना मैंने खोया है उससे कहीं अधिक मैंने पाया है।

मैं यह विश्वास करती हूँ कि किसी को भी एक महत्वहीन जीवन नहीं जीना चाहिए। केवल जन्म लेकर, शिक्षा लेकर, शादी कर, बच्चे पैदा कर और एक दादी बन कर नहीं मरना चाहिए बल्कि दुनिया के लिए कुछ सार्थक योगदान देना चाहिए। मैंने एक उद्देश्यपूर्ण जीवन जिया है। भले ही मैं दुनिया में रहूं या नहीं, पर कहीं, किसी पीढ़ी में सुधा चंद्रन हमेशा जीवित रहेगी।

यह आलेख हमारी सीरीज “बशर की बिसात” का हिस्सा है जो मूल रूप से सुधा चंद्रन द्वारा अंग्रेजी में लिखे आलेख का अनुवादित संस्करण है। अनुवाद का श्रेय अनुभा तिवारी को जाता है।

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