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नियति के खिलाफ़ ऐसी जंग जिसने एक चोर को बना दिया 11,000 बेसहारा लोगों का मसीहा

यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि किसी एक व्यक्ति से बात करके कैसे किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी का रुख ही बदल जाता है। ऑटो टी राजा से हुई सिर्फ 23 मिनट की बातचीत मेरा नज़रिया बदलने के लिए काफी था। यह 50 वर्षीय व्यक्ति बैंगलोर के आस-पास रहने वाले हजारों निराश्रितों और भिखारियों के मसीहा हैं, परन्तु वे हमेशा से ऐसे जिम्मेदार और दयालु नहीं थे।

यह एक ऐसे बिगड़े हुए व्यक्ति थे जिन पर कभी डकैती का आरोप था, परन्तु आज वे सड़कों पर रहने वाले हजारों निराश्रितों के रक्षक हैं। ऑटो टी राजा में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। वे उन सभी के लिए एक रोल-मॉडल बन गए हैं जो सोचते हैं कि जिंदगी में अब आगे बढ़ने के लिए कुछ भी बचा नहीं है। यह कहानी एक पापी से संत बनने की है, ठीक महर्षि वाल्मीकि के कहानी की तरह।

इनका जन्म एक टेलीफोन लाइनमैन के घर हुआ। वे हमेशा माँ-बाप के प्यार और दुलार से वंचित रहे। उन्हें बुरी आदतों की लत बहुत ही जल्दी लग गई थी और इसलिए उन्होंने स्कूल से अपना नाता ही तोड़ लिया। राजा बुरी संगत में फंस कर शराब पीने लगे और जुआ खेलने लगे। अपनी गलत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन्होंने चोरी करना भी शुरू कर दिया।

केनफ़ोलिओज़ को दिए इंटरव्यू में राजा ने कहा — “मैं कुछ ही समय के भीतर डॉन बन गया। यहाँ तक कि मैंने अपनी माँ का मंगल-सूत्र भी चुरा लिया और अंत में मैंने हमारे परिवार की सारी दौलत लुटा दी।”

आखिरकार उनके माता-पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया और उन्हें सड़कों पर रहने के लिए मजबूर होने पड़ा। बस स्टैंड पर एक कचरे का डिब्बा ही उनका बेडरूम बन गया। वे कहते हैं “मैं बिल्कुल सड़क के कुत्ते की तरह हो गया था; मेरा न तो कोई पता था और न ही मेरे पास कोई जीवन की योजना।”

16 वर्ष की उम्र में वे चेन्नई चले गए और वहां एक डकैती का हिस्सा बने। पुलिस ने उन्हें पकड़ कर बाल-सुधार गृह भेज दिया। जेल में राजा को यह महसूस हुआ कि जिंदगी में और भी बहुत कुछ है करने को और उन्होंने ज़रूरतमंदों की मदद करने का निश्चय किया। वे बताते हैं कि उन्होंने प्रार्थना और ध्यान करना शुरू किया और अपनी जीविका के लिए ऑटो रिक्शा चलाने लगे। वे बताते हैं “मैंने बहुत से लोगों को अपनी जिंदगी सड़को पर गंदगी में बिताते देखा है। वहां बहुत से लोग HIV, कैंसर, टीबी,और मनोरोग जैसी बड़ी बीमारियों से ग्रसित रहते हैं।”

राजा के जीवन ने तब पासा पलटा जब एक दिन उन्होंने एक नंगे व्यक्ति को रोड पर पड़े देखा और जो अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था। इस ह्रदय विदारक घटना को देखकर उन्होंने ज़रूरतमंदों के लिए कुछ करने का निश्चय किया। परन्तु ऐसा कुछ करने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे।

1997 में राजा ने अपने घर के सामने एक छोटी सी जगह में ‘न्यू आर्क मिशन ऑफ़ इंडिया’ का शुभारंभ किया। वे सड़क के निराश्रितों को अपनी ऑटो से अपने घर ले आते। वे उनके घावों को साफ करते, नहलाते, साफ कपड़े पहनाते और उन्हें खाना खिलाते थे। राजा बताते “मेरे माता-पिता मुझसे कहते कि मैं बुरा व्यक्ति बन गया हूँ क्योंकि मैं पागल लोगों को अपने घर लेकर आता हूँ।” उनके इस काम में न तो उनके माता-पिता और न ही उनके किसी दोस्त ने उनकी मदद की।

कुछ महीनों बाद उनकी पत्नी ने उनका साथ देना शुरू किया। अब दोनों मिलकर ज्यादा लोगों की मदद कर पाते थे। लोगों की संख्या बढ़ने पर उन्हें ज्यादा जगह की जरूरत पड़ने लगी थी। कुछ समय बाद एक चर्च से उन्हें 5000 रूपये दान में मिले और रहने की थोड़ी जगह भी  मुहैया कराई गयी। यहीं से होम ऑफ़ होप की नींव रखी गई और उनका काम आगे बढ़ा। उसके बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 20 वर्षों से भी अधिक, होम ऑफ़ होप ने लगभग 11000 लोगों की मदद की। 6000 से ज्यादा लोग शांति और सम्मान के साथ मृत्यु को प्राप्त हुए।

वर्तमान में होम ऑफ़ होप ने लगभग 700 लोगों को आश्रय दिया हुआ है जिसमें 80 अनाथ बच्चे शामिल हैं। एक डॉक्टर, साइक्याट्रिस्ट और आठ नर्सें उनकी देखभाल के लिए हैं। राजा उन बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ने भेज रहे हैं और उन्हें आशा है कि वे एक दिन अच्छे नागरिक बनेंगे और ज़रूरतमंदों की मदद करेंगे।

इतने जरूरतमंदों को आश्रय देने वाले राजा का अपना खुद का घर नहीं है। वे कहते हैं –“आशा है ईश्वर मेरे लिए स्वर्ग में एक सुन्दर सा घर बनाएंगे।” वे कर्नाटक को ऐसा राज्य बनाना चाहते हैं जहाँ कोई भिखारी न हो। वे कहते हैं- “ हमें एक और मदर टेरेसा का इंतजार नहीं करना चाहिए कि वे आयें और हमारे देश के लोगों की सेवा करे। हमें उनके जैसा बनना है और गरीब और ज़रूरतमंदों की मदद करनी है।”

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