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दो दोस्त, एक बेहतरीन आइडिया, 20 लीटर दूध से शुरू होकर आज पूरी दिल्ली में फैल चुका है साम्राज्य

ज्यादातर लोगों का सपना होता है कि वह भी औरों की तरह सफलता का एक अनोखा साम्राज्य बनाएं। लेकिन कारोबार शुरू करना, और फिर राह में आने वाली तमाम चुनौतियों का मुकाबला कर उसे सफल बनाना हर किसी से संभव नहीं हो पाता। लेकिन यह सच है कि लक्ष्य प्राप्त करने की इच्छाशक्ति प्रबल हो तो देर ही सही सफलता अवश्य हासिल होती है। हमारी आज की कहानी ऐसे दो दोस्तों की है जिन्होंने अपनी नौकरी छोड़ अपना खुद का कारोबारी साम्राज्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया और आज एक सफल स्टार्टअप का नेतृत्व कर रहे हैं।

दिल्ली के पार्थ वीरेंद्र और साहिल चोपड़ा बचपन के सहपाठी हैं। दोनों ने दिल्ली स्थित डॉन बॉस्को स्कूल से शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद अलग-अलग कॉलेजों से इंजीनियरिंग और फिर एमबीए की डिग्री हासिल की। सफलतापूर्वक डिग्री प्राप्त करने के बाद, वे दोनों प्रबंधन सलाहकार के रूप में दुनिया के विभिन्न कंपनियों के साथ काम किया। हालांकि वे दोनों एक दूसरे से बहुत दूर होने के बावजूद फोन कॉल पर लगातार संपर्क में रहते थे।

साहिल ने केनफ़ोलिओज़ के साथ विशेष बातचीत में बताया कि हम दोनों की बातचीत अक्सर भारतीय बाजार में मौजूद नए व्यापारिक अवसरों के इर्द-गिर्द घूमती थी। हम पिछले पांच वर्षों में बड़े पैमाने पर यात्रा कर रहे थे, हमें इस बात का एक अंदाज़ा लगा कि कैसे और कौन से उद्योग विश्व स्तर पर बढ़ रहे थे और जहां ये अवसर भारतीय व्यापार परिदृश्य के भीतर फिट हो सकते हैं।

दोनों दोस्त प्रायः नए-नए बिज़नेस आइडियाज पर बातचीत करते थे। वह अलग-अलग देशों में उभर रहे कारोबार पर गहन विचार-विमर्श करते और साथ ही भारतीय बाज़ार के संदर्भ में कौन सा बिज़नेस क्रांतिकारी साबित हो सकता है, इसपर काफी शोध किया। अंत में उन्होंने निश्चय किया कि वह लोगों को उनके घर तक जैविक दूध उपलब्ध कराने की दिशा में काम करेंगे। अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जमी-जमाई नौकरी को अलविदा कहने में था।

उद्यमशीलता की भावनाओं में आकर नौकरी छोड़ना एक बहुत ही महत्वपूर्ण निर्णय था लेकिन हमें ख़ुशी है कि आज हम एक प्रसिद्ध ब्रांड के मालिक हैं।

गहन विचार-विमर्शों और भरपूर रिसर्च करने के बाद उन्होंने आखिरकार अपनी नौकरी छोड़ने का फैसला किया और अपने सपनों की नींव रखी। अपने आस-पास के परिचितों को दिन के केवल 20 लीटर दूध सप्लाई के साथ छोटे स्तर पर ‘हैप्पी नेचर’ की शुरुआत हुई। देसी स्वस्थ गायों से दूध की सोर्सिंग, दूध की पैकेजिंग, और यहां तक कि दूध की डिलीवरी भी शुरू में पार्थ और साहिल ने खुद ही किया। उन्हें अपने आइडिया और विचारों पर विश्वास था, इसलिए कम निवेश में भी वह ज्यादातर काम खुद से ही करके कंपनी को शुरूआती मजबूती प्रदान की।

गुणवत्तापूर्ण दूध की सप्लाई कर बेहद कम समय में ही हैप्पी नेचर ने लोगों का का ध्यान आकर्षित किया और उनके ग्राहक वास्तव में दूध की गुणवत्ता में अंतर महसूस कर रहे थे। अब वे लगभग 2000 लीटर दूध और उनसे बने उत्पाद दिल्ली भर में पहुँचाते हैं। वर्तमान में कंपनी का अपना फार्म है, जहाँ सैकड़ों गायों के लिए रहने की व्यवस्था के साथ उनके लिए हरे चारे भी उपजाए जाते हैं।

जो समस्या उन्हें महसूस हुई, वह थी बाजार में भारी मांग के कारण दूध में बढ़ती मिलावट। साहिल कहते हैं कि “हमने देखा कि दूध में मिलावट के कारण कुछ गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हुईं और फिर हमने दूध की दुकानों के तरीके को बदलने का फैसला किया।”

वह वास्तव में मानते हैं कि हैप्पी गाय ही सिर्फ हैप्पी मिल्क दे सकती है। इसलिए उन्होंने अपने गायों के लिए एक तनाव मुक्त और हरा वातावरण बनाया है।

हाल ही में कंपनी ने बेकरी उत्पादों जैसे ब्रेड, बटर आदि भी बनाने शुरू किए हैं। वे अपने ब्रांड को हर भारतीय के लिए उपलब्ध उत्पाद बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की योजना बना रहे हैं।

उनकी कहानी कई मायनों में प्रेरणादायक है। इंजीनियरिंग और एमबीए के बाद जब उन्होंने गौ पालन और दूध बेचने का छोटा व्यवसाय आरंभ किया होगा, तो अवश्य कई लोगों ने उनका मजाक बनाया होगा। लेकिन सिर्फ उन्हें अपनी छोटी शुरुआत के पीछे छिपी एक बड़ी और शानदार सफलता दिख रही थी। और उन्होंने बस पूरी दृढ़ता के साथ अपने लक्ष्य का पीछा किया और आज हमसब उनकी सफलता के गवाह हैं।

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