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जेब में मात्र 103 रुपये, लेकिन आंखों में सपने थे, आज वह चला रहे हैं 3500 करोड़ की कंपनी

वैसे तो जीवन में पढ़ाई का बहुत महत्व है लेकिन सिर्फ स्कूली शिक्षा प्राप्त कर लेने से आपकी सफलता सुनिश्चित हो जाएगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। आज हम एक ऐसे शख्सियत की कहानी लेकर आये हैं जिन्हें गरीबी की वजह से न ही अच्छी शिक्षा मिल पाई और न ही विरासत में कुछ मिला। एक साधारण कमरे से जहां वह अपने 23 सदस्यीय परिवार के साथ गरीबी से जूझते हुए बड़े हुए और अपनी काबिलियत के दम पर आज देश के नामचीन हस्तियों की सूची में शामिल हैं।

गुजरात के अमरेली जिले में एक बेहद ही गरीब किसान परिवार में पैदा लिए गोविंदभाई ढोलकिया के परिवार का मुख्य पेशा खेतीबाड़ी का धंधा ही था। परिवार में कुल चार भाई और दो बहनें थी। गरीबी की मार इतनी भयावह थी कि एक टुकड़े रोटी के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता था। गांव के पुराने खपरैल मकान में ही पूरा परिवार गरीबी से संघर्ष कर रहा था। संघर्ष का यह सिलसिला कई वर्षों तक यूँ ही चलता रहा लेकिन दिनों दिन और बुरी होती जा रही स्थिति को देखते हुए उन्होंने रोजगार की तलाश आरंभ कर दी।

इसी सिलसिले में उन्होंने सूरत का रुख किया और एक कारीगर के यहाँ हीरा तराशने का काम सीखने शुरू कर दिए। उसी के यहाँ रहते, काम करते और खाने को जो कुछ मिल जाता, पेट भर लेते। इतने बुरे समय में भी इन्होंने अपने हौसले को कभी मात खाने नहीं दिया। छह महीनों तक काम सीखने के बाद उन्हें पहली नौकरी मिली लेकिन उनका पहला वेतन महज 103 रुपये प्रति महीने था। इतने कम पगार मिलने के बावजूद उन्होंने खुद का पेट काटकर अपने छोटे भाई को उसकी जेब खर्च के लिए पैसे भेजा करते और खुद की सेविंग्स भी किया करते। कई सालों तक इन्होंने दूसरों के यहाँ काम करते हुए तजुर्बे हासिल किये और अंत में खुद की एक दुकान खोलने को लेकर विचार करने लगे।

12 मार्च 1970 में उन्होंने 5000 रुपये की पूंजी के साथ अपना कारखाना शुरू किया। सिर्फ 7 सालों में, उनकी फैक्ट्री तेजी से बढ़ी। गोविंदभाई बताते हैं कि साल 1977 में जब उनकी मुलाकात मुंबई के डी नवचंद्र कंपनी की शांतिभाई और नवनिभाई मेहता से हुई, जिन्हें वे अपने गॉडफादर की तरह भी मानते हैं, उन्होंने इनके रास्ते को आसान बना दिया। उनकी सहायता से गोविंदभाई बिना कोई दलाल के अपना कारोबार करने लगे जिसके फलस्वरूप अगले चार महीनों में ही इन्हें 9 लाख रुपये का लाभ हो गया।

इसके बाद गोविंदभाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज उनकी कंपनी श्रीराम एक्सपोर्ट्स का सालाना टर्नओवर 3500 करोड़ के पार है।

यह अपने आप में बेमिशाल है कि जिस शख़्स के पास न कोई औपचारिक शिक्षा हो न ही विरासत से कुछ मिला हो और उसने खुद के बूते इतने बड़े साम्राज्य की स्थापना कर डाली। सफलता की परिभाषा इससे बेहतर और क्या हो सकती है।

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