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चलने में असमर्थ होने की वज़ह से कभी लोग उड़ाते थे मज़ाक, आज उनकी उपलब्धि को पूरा देश करता है सलाम

हरियाणा के रोहतक में एक साधारण परिवार में पले-बढ़े, इस व्यक्ति ने अपने बचपन का अधिकांश समय तीव्र गठिया के कारण संयुक्त संक्रमण के कारण बिस्तर पर बिताया। बीमारी ने उन्हें इतना कमजोर बना दिया कि उनकी हड्डियाँ छोटी चोटसे भी फ्रैक्चर हो जाती थी। उनकी माँ का दृढ़ विश्वास था कि वह किसी दिन अपने पैरों पर अवश्य चलेंगे। माता की प्रार्थना और अदम्य इच्छा के साथ प्रयासों ने उन्हें तीव्र गठिया को हराने में मदद की।

आज वही व्यक्ति संग्राम सिंह के रूप में एक कुशल पहलवान हैं, जिन्होंने कॉमनवेल्थ हैवीवेट चैम्पियनशिप जैसे खिताब और पुरस्कार जीते हैं, और साथ ही, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कुश्ती के क्षेत्र में अपनी शानदार सफलता के लिए व्यक्तिगत रुप से सम्मानित किये गए।

संग्राम सिंह ने अपना बचपन रोहतक, हरियाणा में बिताया, जहाँ युवाओं के बीच अखाड़ा संस्कृति सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली चीज़ थी। जब संग्राम ने पहली बार कुश्ती देखी, तो उन्होंने देखा कि पहलवानों को खाने के लिए भोजन और पीने के लिए दूध मिल रहा है। उनकी आर्थिक रूप से अस्थिर पारिवारिक पृष्ठभूमि ने उन्हें कुश्ती की ओर आकर्षित किया, और साथ ही पहलवानों को मिल रहे स्वस्थ आहार का लाभ मिला।

केनफ़ोलिओज़ से खास बातचीत में अपनी प्रारंभिक प्रेरणा के बारे में बताते हुए संग्राम ने कहा “मुझे याद है कि कुश्ती में दाखिला लेने की प्रक्रिया के बारे में पूछताछ करने के लिए जब मैनें कोच से सम्पर्क किया तो, उन्होंने हँसते हुए मेरा मज़ाक बनाया और कहा कि कुस्ती तो दूर पहले अपने पैरों पर खड़ा होकर दिखाओ। इस एक वाक्य उन्हें अंदर तक झकझोर दिया।”

जितनी बार लोगों ने उनकी शारीरिक अक्षमता का मजाक बनाया, उनके अंदर की प्रेरणा उतनी ही प्रबल होती गयी। उनका दृढ़ निश्चय और माँ द्वारा इस्तेमाल की गई विभिन्न आयुर्वेदिक प्रथाओं ने आखिरकार संग्राम को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया। अपनी नई निपुण शारीरिक शक्ति से उत्साहित, संग्राम जल्द ही एक स्थानीय कुश्ती प्रशिक्षण केंद्र (अखाड़ा) में शामिल हो गए। यह सिर्फ शुरुआत थी, लेकिन सफर आसान नहीं होने वाला था। संग्राम ने अपना जीवन कुश्ती के लिए समर्पित किया और चौबीसों घंटे प्रशिक्षण लेना शुरू किया।

संग्राम के लगातार प्रयासों ने उन्हें एक पेशेवर पहलवान के रूप में विकसित किया और उन्होंने स्थानीय से राष्ट्रीय, और राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहलवानी का करतब दिखाया।

उन दिनों को याद करते हुए संग्राम कहते हैं – “मुझे याद है जब मैं मेरी भूख को मिटाने के लिए सिर्फ 50 रुपये में कुश्ती किया करता था। मेरे पास कोई और विकल्प नहीं बचा था।

तमाम चुनौतियों के बावजूद, संग्राम ने एक पेशेवर पहलवान के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए संघर्ष को जारी रखा। उन्होंने दिल्ली पुलिस और भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए 96 किलोग्राम और 120 किलोग्राम हैवीवेट वर्ग में कई खिताब जीते। एक पहलवान के रूप में उनकी लोकप्रियता के कारण, उन्हें भारतीय मनोरंजन उद्योग में भी कई अवसर मिले और वह कई टीवी शो, कुछ फिल्में और रेडियो शो में भी दिखे।

इतनी सफलता और प्रसिद्धि हासिल करने के बाद भी संग्राम अपनी जड़ों से जुड़े रहकर एक और दुर्लभ उदाहरण स्थापित किया है। वह अपनी सारी सफलता का श्रेय उन लोगों को देते हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में उन्हें आगे बढ़ने में मदद की। समाज ने जो उन्हें दिया, उसे वापस करने के लिए संग्राम दृढ़ संकल्पित हैं।

संग्राम अपना अधिकांश समय अपने गृह नगर में बिताते हैं, जहाँ वे लगभग 300 युवाओं का ट्रेनिंग मुहैया करा रहे हैं। हो सकता है, किसी दिन, उनका एक छात्र भारत के लिए ओलंपिक स्वर्ण प्राप्त करे, कुछ ऐसा जो कई प्रयासों के बावजूद वह खुद नहीं कर सके।

संग्राम की यात्रा एक मजबूत उदाहरण है जो सभी बाधाओं को हराकर, मंजिल प्राप्त करने के लिए आम लोगों में आशा का संचार करती है।

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