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कलेक्टर बनने के सपने को छोड़ ऐसा काम कर दिखाया कि IAS अफसरों के लिए बन गईं प्रेरणास्रोत

आज भी हमारे देश में कई ऐसी ख़ानाबदोश जनजातियाँ हैं जिन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयत्न करना चाहिए और यह हमारा दायित्व भी है। हमारे देश में करोड़ों लोग आज भी ऐसे हैं जिनकी अपनी कोई पहचान नहीं हैं हम बस उन्हें उनके काम से जानते हैं जैसे कोई चाकू की धार तेज़ करने वाला तो, कोई रस्सी पर चलकर करतब करने वाला इन लोगों के पास वो आम सुविधाएँ नहीं हैं जो की भारत के अन्य नागरिकों को प्राप्त हैं क्योंकि उन भोले-भाले लोगों में जानकारी का अभाव है। उन बंजारों के उत्थान के लिए अपनी आवाज बुलन्द की है गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली मित्तल पटेल ने।

मित्तल एक पत्रकार के रूप में सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही थी। लेकिन आज वह खानाबदोश समुदाय के लोगों को न सिर्फ उनका अधिकार दिला रही हैं बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए दिन-रात एक कर रही हैं। आपको बता दें जब मित्तल पटेल पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही थी तो उस दौरान ही उनको इस तरह के लोगों से मिलने का मौका मिला। उस समय मित्तल ने जाना कि अकेले गुजरात में सरकारी दस्तावेजों में 28 ख़ानाबदोश जनजातियां शामिल हैं और उनमें से भी 12 ऐसी जनजातियां थी जो किसी सरकारी कागज में दर्ज तक नहीं थी क्योंकि घुमंतू होने के कारण उनकी अपनी कोई पहचान नही थी।

न तो उनके पास वोटर आईकार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, पासपोर्ट प्रमाण नही था। और साथ ही ये लोग ऐसा कोई काम नहीं करते हैं जो एक जगह रहकर ज्यादा दिन तक किया जा सके। इनका कोई एक ठिकाना नहीं था घुमक्कड़ जीवन जीने वाले यह लोग बदलते परिवेश से अंजान थे।

मित्तल पटेल ने जब यह सब देखा तो उन्होंने सोचा कि इस बात की जानकारी सरकार और ख़ानाबदोश लोगों के लिए काम करने वाली स्वंयसेवी संगठनों से साझा करनी आवश्यक है ताकि वे उनकी समस्याओं को दूर कर सके लेकिन उन लोगों के बारे में करीब से जानकर उनकी समस्याओं को जाना तो उन्होंने निर्णय लिया कि क्यों ना खुद ही इस क्षेत्र में काम किया जाये।

अपने निर्णय को कार्य में बदलते हुए मित्तल ने “विचरता समुदाय समर्थन मंच” की स्थापना की। उनके संगठन ने खानाबदोश लोगों की दिक्कतों को दूर करने के लिए साल 2007 में गुजरात के तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त से मुलाकात की और उनको अपनी बात का यकीन दिलाने में कामयाब रहीं कि उन बंजारों के लिए भी वोटर आई कार्ड कितने जरूरी हैं। उनके प्रयासों के बाद आयोग उन लोगों के वोटर आई कार्ड बनाने को तैयार हुआ। मित्तल की संस्था की मेहनत रंग लाई और पहली बार में 20 हजार से ज्यादा घुमंतू जनजाति के लोगों के वोटर आई कार्ड बनवाये गए।

मित्तल पटेल बताती है कि “ज्यादातर लोगों को ये नहीं पता होता कि इन घुमंतू लोगों के साथ कैसे काम किया जाए लेकिन हमने समझ लिया था कि घुमंतू जाति के लोग भले ही साल भर कहीं भी घूमे लेकिन मॉनसून के दौरान वो यात्रा नहीं करते। वो हर साल ऐसे गांव में ठहरते हैं जहां उनको सबसे ज्यादा प्यार और अपनापन मिलता है। इस बात को हमने चुनाव आयुक्त के सामने भी रखा और आयोग से कहा कि जहां पर ये लोग मॉनसून के मौसम में हर साल ठहरते हैं उसे इनका स्थायी पता मान लेना चाहिए। इस तरह उस गांव को मिलने वाली सभी सुविधाओं के वो लोग भी हक़दार बन गए।”

उनके प्रयासों से उन लोगों के वोटर आई कार्ड ही नहीं बल्कि राशनकार्ड और दूसरी सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलने लगा। आज मित्तल पटेल 72 हजार से ज्यादा लोगों के वोटर कार्ड बनाने में मदद कर चुकी हैं। कुछ समय पूर्व ही एक कैम्प के जरिये उन्होंने 500 ख़ानाबदोश लोगों के वोटर कार्ड बनवाएं हैं। लेकिन मित्तल का काम सिर्फ वोटर कार्ड या राशन कार्ड बनवा कर ही पूरा नहीं हुआ ये तो बस काम की शुरुआत भर थी।

उन्होंने अपनी संस्था “विचरता समुदाय समर्थन मंच” के जरिये ऐसे जगह पर टेंट स्कूल चलाये जहां पर घुमंतू जाति के लोगों बहुत अधिक संख्या में रहते थे। आज की तारीख में गुजरात में उनका संगठन 13 जगहों पर टेंट स्कूल चला रहा है। उनके प्रयास की बदौलत आज गुजरात में 40 खानाबदोश जनजातियों में से 19 जनजातियों के बच्चों तक प्राइमरी शिक्षा पहुँच रही हैं। जहाँ पहली क्लास से लेकर दसवीं क्लास तक की पढ़ाई कराई जा रही हैं।

जब मित्तल से पूछा गया कि खानाबदोश लोग जब एक जगह पर नहीं रहते हैं तो उनके बच्चे एक जगह रहकर कैसे पढ़ाई करेंगे? इस सवाल के जवाब में मित्तल पटेल ने कहा कि “हमने देखा की बंजारा समुदाय के लोग अपने बच्चों को पढ़ाना तो चाहते थे लेकिन वो काम धंधा भी नहीं छोड़ सकते थे इसलिए उनको दूर दराज के इलाकों में जाना पड़ता था। इस समस्या से निपटने के लिए हमने सौराष्ट्र, अहमदाबाद और राजनपुर में 4 होस्टल खोले। जहां आज सात सौ बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे में उनके मां बाप भले ही महीनों काम पर चले जायें लेकिन उनके बच्चे एक जगह रहकर पढ़ाई कर सकते हैं।”

दूसरी ओर मित्तल पटेल और उनकी टीम ने देखा की इन घुमंतू जातियों जे लिए वर्तमान में सबसे प्रमुख रोजगार का संकट पैदा हो गया है। इस वजह से बंजारा समुदाय के काफी लोगों को भीख मांगने का काम शुरू करना पड़ा। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इन लोगों ने उनको वोकेशनल ट्रेनिंग देने का काम भी शुरू किया है।और अब तक करीब तीन सौ लोग वोकेशनल ट्रेनिंग ले चुके हैं।

अब बंजारा समुदाय के लोग चाय की दुकान खोलने से लेकर, सब्जी की दुकान, चूड़ियाँ और बिंदी बेचने का काम या फिर ऊंट गाड़ी खरीदने के लिए लोन तक लेने लगे हैं ताकि वो दूसरों के समान को एक जगह से दूसरी जगह लाने ले जाने का काम कर सकें।

मित्तल पटेल बताती हैं कि “लोगों ने रोजगार के नए अवसरों का स्वागत किया हैं तभी तो मार्च, 2014 से अब तक ये लोग 430 बंजारा समुदाय के लोग सरकारी सुविधाओं का लाभ लेकर अपना रोजगार शुरू कर सकें हैं।”

इतना ही नही ख़ानाबदोश जाति के लिए उनकी संस्था पक्के घर बनाने की व्यवस्था भी कर रही है जो कि चुनौती भरा काम हैं।  लेकिन मित्तल पटेल और उनकी टीम इन लोगों को अपने घर बनाने में ना सिर्फ तकनीकी तौर पर बल्कि आर्थिक रुप से भी मदद करते हैं और अब तक 265 घर बनवा चुके हैं जबकि 300 घर बनवाने का काम युद्धस्तर पर जारी हैं। आज मित्तल पटेल और उनकी संस्था गुजरात के 9 जिलों में बंजारा समुदाय के लोगों के विकास का काम कर रही है। वाकई मित्तल पटेल और उनकी टीम जो कर रही है वह क़ाबिले तारीफ़ है।


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